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दिल्ली के लिए ....

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क्या है ? समां - ए - दर्द का , मुझसे कहा जाता नहीं । है रो रही ये बच्चियां , मुझसे सहा जाता नहीं ।। बढ़ रहे हैं पाप अब , पर्वत पिघलनी चाहिए। हो कहीं भी आग पर,  ये आग  जलानी चाहिए ।। खोखलेपन में जी रही , दिल्ली सुधारनी चाहिए। ज्वाला जल लो दिल में की , दुनियाँ बदलनी चाहिए ।।                                       आशीष पाण्डेय "देव"         

......इन तनहा-तनहा रातों में

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ना जाने कितना रोया हूँ  , इन तनहा - तनहा रातो में ।  ना जाने कब से खोया हूँ , तेरी प्यारी -प्यारी बातों  में ।। ना जाने कब से रोग मुझे , चोरी से आकर लगा गयी । ना जाने कब सोती आँखों से , मेरी निंदिया चुरा गयी ।।  पहले तो सोता था रातों में, ना डूबा रहता था ख्वाबों में ।  ना मैं कभी घूमने गया कभी , था इसके पहले बागों में ।।                                          आशीष पाण्डेय "देव"                                                                आगे पढ़ाने के लिए थोड़ा इंतज़ार करें .........

श्रृंगार - भाग द्वितीय

अरमान हमारे रुक ना सके , वो यार हमारे रुक ना  सके । हम पलकें तो बिछाए बैठे थे , पर आंसू के धार हमारे रूक ना सके ।। जुल्फों की शरारत , होठो की नमी , आँखों का नशा निराला है  । वो प्यार हमारा अम्बर सा , और यार चमकता सितारा है ।।  आँखों में काजल की रेखा , तो दो धारी  तलवार लगे । औ पतली कमर कमानी सी , पानी में चलती पतवार लगे ।। कंचन सी काया दिलवर का , दिनकर देखकर जलता है । सुनीता  की नज़ाकत सीता सी , दिल बर्फों की तरह पिघलता है ।।  कंगने की खनक, पायल की छनक , झरने की कल-कल जैसी है । गोरी अंगुली में अंगूठी की चमक , हीरे की नजाकत जैसी है ।। पलकें झुका ले शाम  औ पलकें उठा ले दिन खिले ।  जैसे विरहणी राधिका से , श्याम आकर फिर मिले ।। बोले तो वो ऐसे लगे , जैसे गीत गाती कोकिला । अंदाज़ ऐसे हैं कि जैसे, मुस्कुराती हो शिला ।। आज उसके आगमन से , है फूल बरसाता चमन । दिल शहादत दे रहा है , नयन करते है नमन ।।               ...

श्रृंगार

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 एक नजर  लगी उसकी  मुझको और मै दीवाना हो गया , वो ऐसी अदा थी हुस्न की मै बैठे-बैठे खो गया     । क्या रंग है , क्या रूप है  क्या गालों पर है  लालिमा, रेशम से घने बादल जैसे क्या बालों पर है लालिमा  । अनजान सा पच्छी मै उड़ता था  दूर - दूर तक अंबर में , अब याद आ रही है उसकी  तो घूर  रहा हूँ समुन्दर  में  ।  हिरनी से नयन , नागिन सी कमर  और गोर  बदन कंवारे हैं , कमसीन नज़ाकत  नूर भरे  मनो रचनाकर स्वयं  सँवारे है । कानों के  उसके कर्णफूल  सागर के मोती जैसे है ,  माथे की  उसके बिंदिया तो  चन्दा की ज्योति जैसे हैं ।  सूरज भी हमेशा शर्माता है  उसके होठों की लाली से,  काली रातें  मुर्झाती हैं , उसके भौहों की काली से   ।  उसके नाजुक स्तन के उभार  हिमगिरी की नज़ाकत जैसी हैं  होठों के बीच दाँतो की चमक, सावन में क़यामत  जैसी हैं...

युवा ...

जो सुनाने से अश्रु  बहा दे , वो बेजोड़ कहानी होती है । जो जल से ज्वाला भभका दे , वो ही तो जवानी होती है ।।             ------------*********------------ जो रच कर कविता का पाठ करे , वो कवियों की रवानी होती है । जो बहती धारा को उल्टा मोड़े  , वो मर्दों की जवानी होती ।।              ------------*********------------  जो धरती से अम्बर जोड़े , वो भारत के युवा का  भेजा है । जो मरते दम तक जय-जय बोले , वो भारत माँ का कलेजा है ।।            ------------*********------------ हम ऐसी माँ के बेटे है , जो खुद से राह बनाते है । जज्बात लिए अंगारों सा , बस मंजिल को बढ़ते जाते है ।।            ------------*********------------ हम है एक ऐसी शक्ति पुंज , जो मुश्किल को अंग-भंग कर देते है । जो खुल जाये जुबाँ सभा में तो , बुड्ढो को यंग कर  देते है ।।                ...

आज के बदलते वक्त और उससे भी ज्यादा बदल रहे मानव की हकीकत

100 रुपये का नोट किसी को देना बहुत बड़ा लगता है लेकिन किसी होटल में यही नोट बहुत छोटी लगाती है।  वेलेंटाईन डे पर अपनी प्रेमिका को 500 रुपये का गिफ्ट दे देते है  जिसे वो बस चन्द दिनों से जानते है पर मदर्स डे पर माँ के लिए 5 रुपये का गुलाब नहीं दे सकते जो उन्हें पाल -पोशकर  इतना बड़ा बनाती है। 50 रुपये के सिगरेट  पीना आज के युवाओ  के लिए आम बात है पर 50 पैसे किसी गरीब की झोली  में डालना इनके लिए पहाड़ लगता है।  प्रेमिका के साथ 3 घंटे की फिल्म देखने में इन्हें उबन नहीं आती पर माँ के 3 मिनट पैर दबाने में ये उब जाते है। ये शायद इन बातों से परे है की जो ये आज कर रहे है बिलकुल वही निकट भविष्य में इनके साथ भी घटित होने वाला है  अपनी प्रेमिका से पूरी रात बात करने में इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता पर माँ के साथ मंदिर जाने में इनका समय बर्बाद होता है।  मोबाईल में 100 रुपये का रीचार्ज करवा के प्रेमिका  से बात करने में इनका पैसा बर्बाद नहीं  होता पर भगवान  के मंदिर में 1 रुपये चढ़ाने से इनका पैसा बर्बाद होता है।  ...

हर रोज तेरी याद आती है ....

मै  25 अक्टूबर  को इलाहाबाद से घर जाने के लिए ट्रेन का इन्तजार कर रहा था ! इन्तजार की वो घड़ी ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे ठंडी के महीने में लोग धुप का इन्तजार कर रहे हो और सूरज बदल में से बहार आने का मन ही न बना रहा हो ! मै हर 3-4 मिनट पर अपनी घडी को देख - देख कर बस यही सोच रहा था की बस अब ट्रेन आने ही वाली है पर वो समय इतना जल्दी कहाँ  आने वाला था ? कुछ आधे घंटे बीते थे की मेरे बगल में ही एक चाचा जी अपनी भतीजी जिसका नाम 'कोमल' था आकर बैठ गया तब मुझे लगा की चलो कोई तो आया जो मेरे साथ बैठ कर मेरे इन्तजार के साथी बने, परन्तु कुछ देर बाद यह पता चला की वो चाचा जी अपने दोनों कानो से सुनने में असमर्थ थे !कोमल अपने चाचा जी के साथ अपने घर वाराणसी जा रही थी ! मई कोमल से बातें ही कर रहा था की ट्रेन वह आ गयी और हम एक सीट लेकर आराम से बैठ गए ! हमारे बातो का सिलसिला चलता रहा ! बातो ही बातो में मैंने उसके चाचा जी के बारे में पूछा तो उसने उनके कान के परदे फट जाने के वजह से ना सुन पाने का कारन बताया और उसने यह भी बताये की यदि कोई उनसे लिख-लिखकर बातें करे तो आराम से बातें कर ...