हर रोज तेरी याद आती है ....
मै 25 अक्टूबर को इलाहाबाद से घर जाने के लिए ट्रेन का इन्तजार कर रहा था ! इन्तजार की वो घड़ी ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे ठंडी के महीने में लोग धुप का इन्तजार कर रहे हो और सूरज बदल में से बहार आने का मन ही न बना रहा हो ! मै हर 3-4 मिनट पर अपनी घडी को देख - देख कर बस यही सोच रहा था की बस अब ट्रेन आने ही वाली है पर वो समय इतना जल्दी कहाँ आने वाला था ? कुछ आधे घंटे बीते थे की मेरे बगल में ही एक चाचा जी अपनी भतीजी जिसका नाम 'कोमल' था आकर बैठ गया तब मुझे लगा की चलो कोई तो आया जो मेरे साथ बैठ कर मेरे इन्तजार के साथी बने, परन्तु कुछ देर बाद यह पता चला की वो चाचा जी अपने दोनों कानो से सुनने में असमर्थ थे !कोमल अपने चाचा जी के साथ अपने घर वाराणसी जा रही थी ! मई कोमल से बातें ही कर रहा था की ट्रेन वह आ गयी और हम एक सीट लेकर आराम से बैठ गए ! हमारे बातो का सिलसिला चलता रहा ! बातो ही बातो में मैंने उसके चाचा जी के बारे में पूछा तो उसने उनके कान के परदे फट जाने के वजह से ना सुन पाने का कारन बताया और उसने यह भी बताये की यदि कोई उनसे लिख-लिखकर बातें करे तो आराम से बातें कर सकते है और उन्हें कई भाषाओ का अच्छा ज्ञान भी है , मुझे यह जान कर बड़ा ही अफसोश हुआ ! फिर मैंने कोमल से उसके पढ़ाई के बारे में पूछा तो उसने कहा की वह इलाहबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी विषय से एम . ए . प्रथम वर्ष की छात्रा है। वह अपने नाम की तरह दिखने में भी खुबसूरत और स्वभाव से इतनी कोमल थी जैसे कोई न खिली हुई गुलाब गुलाब की कली। उसकी भावनाए उसके लक्ष्य के प्रति बिलकुल दृढ़ थे।
वो कहती थी - "ज़िन्दगी की सब्जी में अगर प्रेम का नमक मिला दिया जाए तो ज़िन्दगी ज़न्नत नजर आती है और यदि इसमे नमक डालना भूल जाए या गुरुर बस इसे ना मिलाये तो पूरी ज़िन्दगी उस सड़े कब्रिस्तान की तरह लगती है जिसमे मुर्दों की सिर्फ फीकी कब्रे और और उनसे आती साय - साय की आवाजे ही रह जाती है। हमें हमेशा एक दुसरे से प्रेम करना चाहिये क्योकि यही एक ऐसी चीज है जो किसी को दो तो मरने के बाद भी इसे लोग गुन -गुनाते रहते है और यह एक ऐसी छाप है जिसे जितना मिटाओ उतना ही गाढ़ा होता जाता है अर्थात इसे जितना भुलाओ उतना ही और याद आता है लेकिन कभी ना तो मिटता है और ना ही भुला जाता है और लोग पीढ़ियों - पीढ़ियों याद करते रहते है। "
वो सब लड़कियों से अलग थी। उसने मेरे बारे में भी बहुत कुछ पुछा। हमारी बातो का सिलसिला इतना चला की मै ये भी भूल गया की मुझे उतरना भी है। मई अचानक ही उससे बाते करते-करते बहार देखा तो मेरी ट्रेन उसी स्टेसन से छूटने वाली थी जहाँ मुझे उतरना था , मै झट-पट अपना बैग उठाया और उससे शुभ - यात्रा कहते हुये बाहर ही उतारा था की ट्रेन तेज हो गयी और हम लोग बस चंद मिनटों में समुन्दर के दो किनारों की तरह एक दुसरे से दूर हो गए पर आज भी उसकी वो बाते और उसकी मासूमियत भरी सोच मुझे याद आती है और मै शायद उसे भूल भी जाऊ पर उसकी वो बाते मई कभी नहीं भूलूंगा। .........
आशीष पाण्डेय "देव "
वो कहती थी - "ज़िन्दगी की सब्जी में अगर प्रेम का नमक मिला दिया जाए तो ज़िन्दगी ज़न्नत नजर आती है और यदि इसमे नमक डालना भूल जाए या गुरुर बस इसे ना मिलाये तो पूरी ज़िन्दगी उस सड़े कब्रिस्तान की तरह लगती है जिसमे मुर्दों की सिर्फ फीकी कब्रे और और उनसे आती साय - साय की आवाजे ही रह जाती है। हमें हमेशा एक दुसरे से प्रेम करना चाहिये क्योकि यही एक ऐसी चीज है जो किसी को दो तो मरने के बाद भी इसे लोग गुन -गुनाते रहते है और यह एक ऐसी छाप है जिसे जितना मिटाओ उतना ही गाढ़ा होता जाता है अर्थात इसे जितना भुलाओ उतना ही और याद आता है लेकिन कभी ना तो मिटता है और ना ही भुला जाता है और लोग पीढ़ियों - पीढ़ियों याद करते रहते है। "
वो सब लड़कियों से अलग थी। उसने मेरे बारे में भी बहुत कुछ पुछा। हमारी बातो का सिलसिला इतना चला की मै ये भी भूल गया की मुझे उतरना भी है। मई अचानक ही उससे बाते करते-करते बहार देखा तो मेरी ट्रेन उसी स्टेसन से छूटने वाली थी जहाँ मुझे उतरना था , मै झट-पट अपना बैग उठाया और उससे शुभ - यात्रा कहते हुये बाहर ही उतारा था की ट्रेन तेज हो गयी और हम लोग बस चंद मिनटों में समुन्दर के दो किनारों की तरह एक दुसरे से दूर हो गए पर आज भी उसकी वो बाते और उसकी मासूमियत भरी सोच मुझे याद आती है और मै शायद उसे भूल भी जाऊ पर उसकी वो बाते मई कभी नहीं भूलूंगा। .........
आशीष पाण्डेय "देव "
wow Ashish Kya Gazab ki baat likhe hai aap. bahut achchha .. waise aap ki koi bhee kavitaa ya kahani kharab he kaha hoti hasi psr ye un sab bhee jyada fine and fantastic hai.......
ReplyDeleteWish you happy New year in advance ..
I request u to u to write a poem for me....