श्रृंगार - भाग द्वितीय

अरमान हमारे रुक ना सके ,
वो यार हमारे रुक ना  सके ।
हम पलकें तो बिछाए बैठे थे ,
पर आंसू के धार हमारे रूक ना सके ।।

जुल्फों की शरारत , होठो की नमी ,
आँखों का नशा निराला है  ।
वो प्यार हमारा अम्बर सा ,
और यार चमकता सितारा है ।। 

आँखों में काजल की रेखा ,
तो दो धारी  तलवार लगे ।
औ पतली कमर कमानी सी ,
पानी में चलती पतवार लगे ।।

कंचन सी काया दिलवर का ,
दिनकर देखकर जलता है ।
सुनीता  की नज़ाकत सीता सी ,
दिल बर्फों की तरह पिघलता है ।। 

कंगने की खनक, पायल की छनक ,
झरने की कल-कल जैसी है ।
गोरी अंगुली में अंगूठी की चमक ,
हीरे की नजाकत जैसी है ।।

पलकें झुका ले शाम 
औ पलकें उठा ले दिन खिले । 
जैसे विरहणी राधिका से ,
श्याम आकर फिर मिले ।।

बोले तो वो ऐसे लगे ,
जैसे गीत गाती कोकिला ।
अंदाज़ ऐसे हैं कि जैसे,
मुस्कुराती हो शिला ।।

आज उसके आगमन से ,
है फूल बरसाता चमन ।
दिल शहादत दे रहा है ,
नयन करते है नमन ।।

                                                                आशीष पाण्डेय 'देव '
 





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