उल्टा दौर .........
बदलते ज़माने के साथ , आदमी भी बदलने लगा
फैसन अब खुलके , आसमान पे चलने लगा
अब चिट्ठी की बात , मोबाईल में बदल गयी
वो नारी अबला से , बला में बदल गयी
नयनो में लगा के काजल , बालों को छितराती है
होठो पे लगा के लिपस्टिक, तब कालेज में आती है
पढाई के बहाने कालेज में , होता है दिलो का मेल
बाप की कमाई पे , बेटियाँ खेलती है ऐसा खेल
जानते हुए भी आदमी, कुछ नहीं बोल पाता है
क्योकि उसके सर पे , पत्नी का डर सताता है
कल तक तो रही थी पत्निया, अपने पतियों के वश में
आज वही पत्निय , डर भरती है, अपने पतियों के नस में
चलता रहा जो ऐसा , तो आएगा जल्द वो काल
जब पत्नियाँ अपने पतियों का , कर देंगी जीना मोहाल
आशीष पाण्डेय "देव"
Ashish bhai bilkul sahi likhate ho.
ReplyDelete