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एक सुमन का सवाल ...

खिलता हूँ मै तो तुम,  खिलने न देते,  बढ़ने हूँ मै तो तुम, बढ़ने ना देते, कैसे हो मानव ? ना  बढ़ने हो तुम, और ना हमें  बढ़ने देते, लगाने का शौक गर, नहीं पलते तो, तोड़ने का हमको ,  शौक क्यों पलते हो? कैसे हो मानव? जो ना सजाते हो दामन, और सजाते है हम तो, ज़हर डालते हो, जब थे हम छोटे-छोटे,  तो जगह से जगह बदल दिया,  जब फूल लगे हममे छोटे , तो चुटकी से पकड़ कर मसल दिया, कैसे हो मानव? जब सही राह ना पकड़ सका तो , बुरा मार्ग ही पकड़ लिया. भगवान समझकर मानव को, मेरी माला पहनते हो, जो क्षड़ भर बीत गया तो,  पैरों के तले दबाते हो  कैसे ही मानव? जो एक नाचीज को इज्जत देकरके, हमारी इज्जत को गवाते हो ! तू देख जरा मधुमक्खी को, वो फूलों-फूलों मडराती है,  चूस-चूस के फूलों के रस, वो मीठा मीठानाती है,  कैसे हो मानव? जो खुद  की  जान बचने को,  दूसरो की बली चढ़ाते हो !                      ...

सच्ची ज़िंदगी

फूलों की कली है ज़िन्दगी,  ओसों की नमी है ज़िंदगी,  अपनों की कमी है ज़िन्दगी,  अम्बर और ज़मीं है ज़िन्दगी !                                 दुःख में ख़ुशी रहना है ज़िन्दगी,                                 आंसू छिपाकर हँसना है ज़िन्दगी,                                 खुद भूखा रहकर पेट भरना है ज़िन्दगी,                                  दुःख भुलाकर प्रेम भेट करना है ज़िन्दगी ! नहीं है ज़िन्दगी ------ मुश्किल में रोते रहना, सुख में सोते रहना,  मंजिल को खोते रहना , डोर जीवन की तोड़ते रहना !                                   मुश्किल में...

शराब "कलयुग का अमृत"

इश्वर से भेंट कराने की, उच्चारण शुद्ध करने की, की दुनिया में नाम बढ़ाने की, यह दवा है एक ऐसी जनाब...                             जिसका नाम रखा हमने शराब... आलस्य को दूर भगाती है, दो बिछड़े दिलों को मिलाती है, ये दुःख की घड़ी को भुलाती है, सुख की गठरी है ये जनाब...                            जिसका नाम रखा हमने शराब... सुन्दर सी कली है ये शराब, महलों की परी है ये शराब, अम्बर से गिरी है ये शराब, धरती पे पली है ये जनाब.....                          जिसका नाम रखा हमने शराब... आँखों की ज्योति बढ़ाती है, चंचल काया को बनाती है, दो युगल प्रेमियों को मिलाती है, जीनें का मजा देती है जनाब... ...

मन का लहर

एक दिन एक दीवाने ने, पूछा अपनी दीवानी से, क्यों देख मुझे सब दीवाने, करते पसंद दूर चला जाने, क्यों देख मुझे सब जलतें हैं, गुस्से से दामन भरते हैं, क्यों नफ़रत है इतना मुझसे , है प्यार उनको जितना तुमसे, तब हंस कर दीवानी बोली, दिल का अपने आँचल खोली, दिल प्रेम हस्त से सहलाया, उसको जबाब फिर बतलाया, तुममें है इतनी गर्मी, देखने से तुम्हे न आती नर्मी, फिर पूरा बदन पिघलता है, अन्दर-अन्दर दिल जलता है, और मैं हूँ बर्फों की झिल्ली, एक शीतल प्रेम रस की झिल्ली, दिल देखकर के शीतल होता, और मन में प्रेम बीज बोता, पाने की सबको आकान्छा होती , सोचे गर पास मेरे होती, जुल्फों की छांव में सो जाता, जीवन भर शीतल हो जाता,                                            --------     आशीष पाण्डेय "देव"

उल्टी गंगा...

कल का भविष्य ऐसा होगा, सब वेद ग्रन्थ पैसा होगा  तब संतों की दुरगति होगी , औ लुच्चो की इज्जत होगी  सब पाप रीती अपनाएंगे, धर्म रीती को हटाएँगे वो पाप का खेला खेलेंगे, औ धर्म की इज्जत लूटेंगे अबला हो जाएगी बला, पुरुषों का करेगी हला-भला  लातों से बात करेंगी वो , पुरुषों  को  न जीने देंगी वो  औरतें रहेंगी ऑफिस में, पुरुष भोजन पकाएगा  थकी हुई लुगाई का,  रात में पैर भी दबाएगा   जो बुरी नज़र पुरुषों की हो, तो आंख उनकी फोड़ेंगी वो  जो गलत किया थोडा सा भी तो, हाँथ - पांव तोड़ेंगी वो  कशी-प्रयाग का नाम न होगा, घर का नाला संगम होगा  अध्ययन करेंगे अध्यापक, छात्रों से अध्यापन होगा  जिसको खुद का भी ज्ञान नहीं, वो होगा तपश्वी सन्यासी  जिसको यथार्थ का ज्ञान सही, वो होगा पापी सत्यानाशी  जब पाप देश में सना होगा, दुर्गति का भी दुर्गति होता होगा  जब सागर का पाप गहना होगा, तब मजबूरन हमें उल्टी गंगा  कहना होगा !!                             ...

कल का कलयुग

यह कथा नहीं एक सत्य कथा है , आने वाले कलयुग का नाम मिटा देने वाली , उस सतयुग के स्वर्ण सुख का  आयेगी ऐसी बयार, मिट जाएगा सब नामों निशान  सब वेद ग्रन्थ मिट जायेगा, बन जाएगा पापों का एक मिसाल  जब सावन में बारिश होगी, उसमें आगों की नमी होगी  ये धर्म नगरी जलती होगी, चरों तरफ आग-आग होगी कुछ दिन में प्रलय आ जायेगा, यम का काला  बादल छाएगा  ये विश्व धरा मिट जाएगी और अंगारे-अंगारों को खायेंगी                                                                    आशीष कुमार पाण्डेय  "देव"

हजार गुड अन्ना हजारी के

खुद शुख ना करे वो, दूसरो को शुख की नीद सुलाता है, भ्रस्टाचार अन्याय के खिलाफ, सदा ही वो चिल्लाता है, सभी न्याय के हकदारों को , न्याय की कुर्सी दिलाता है, अन्यायी, पापी, दुस्कर्मियों को, काल की नीद सुलता है,  जिसकी बातो को कोई ना सुने, उसकी भी बात उठता है, न्याय दिलाकर उनको भी, सुख की हँसी  हसता है, ऐसा देखकर पापियों दुस्कर्मियों की, कटती नहीं अब मस्ती है, सरकार भी जो गलत करे, तो जलती उसकी बस्ती है,  वो मातृभूमि का रखवाला, गरीबो के मुह का है प्याला, भ्रस्टाचार बुराइयों को, जलाने का है गोला, ज्वाला,  उठ जाओ प्यारे अब तुम भी, और दे दो उनका साथ,  रक्षा करने को जननी का, अब बढाओ हाथ से हाथ,                                                                     आशीष पाण्डेय "देव"