श्रृंगार

 एक नजर  लगी उसकी  मुझको
और मै दीवाना हो गया ,
वो ऐसी अदा थी हुस्न की
मै बैठे-बैठे खो गया     ।

क्या रंग है , क्या रूप है 
क्या गालों पर है  लालिमा,
रेशम से घने बादल जैसे
क्या बालों पर है लालिमा  ।

अनजान सा पच्छी मै उड़ता था 
दूर - दूर तक अंबर में ,
अब याद आ रही है उसकी 
तो घूर  रहा हूँ समुन्दर  में  । 

हिरनी से नयन , नागिन सी कमर 
और गोर  बदन कंवारे हैं ,
कमसीन नज़ाकत  नूर भरे 
मनो रचनाकर स्वयं  सँवारे है ।

कानों के  उसके कर्णफूल 
सागर के मोती जैसे है , 
माथे की  उसके बिंदिया तो 
चन्दा की ज्योति जैसे हैं । 

सूरज भी हमेशा शर्माता है 
उसके होठों की लाली से, 
काली रातें  मुर्झाती हैं ,
उसके भौहों की काली से   । 

उसके नाजुक स्तन के उभार 
हिमगिरी की नज़ाकत जैसी हैं 
होठों के बीच दाँतो की चमक,
सावन में क़यामत  जैसी हैं  ।

आँखों में काजल की रेखा 
तलवार के धारों जैसी हैं 
आवाज़ कूकती कोयल सी, 
पाजेब सितारों  जैसा हैं   ।

मुस्कान  गुलाबों जैसा है 
अंदाज़  बहारों जैसा है 
लाल - गुलाबी पलकें तो ,
गंगा के करारों जैसा है     । .......................

                                      आशीष पाण्डेय " देव "


    

Comments

  1. ab mai kuchh kahi nahi paa rahi bas itna kahungi ki itna meetha mat likho nahi to jaan chali jayegi......

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  2. wow . ghazab kya shringar ki rachana ki hai apne mai to aaj pahli baar aise aoutomatic web khul jaane se mai is poem ko pathi aur apne aap ko comment dene se rok nai paayi mai poori kavitaye aapki regular parhungi .


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  3. thanks my dear reader and thanks for your courageful comments...



    Kavi Dev

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