करम अपना-अपना...
किसी को है मिलाती घी चुप्पी रोटी,
किसी को है सुखी रोटी को तरसना,
यही है भाई करम अपना-अपना ...
एक भाई दुसरे के, दुःख पर है हंसता,
मरते प्यासे भाई पर, पानी भी नहीं छिड़कता
एक को है मिलता, राजशी खाना,
दुसरे को तो है भूखे ही मरना
यही है भाई करम अपना-अपना ...
कलयुग की ऐसी कड़ी की लड़ी में,
मरना है प्यासे को पानी की झड़ी में,
नसीब नहीं है दुखिया को, पानी के भी छीटें पड़ना,
सुखियों के सर पर है बहता, मीठे पानी का सुन्दर झरना,
यही है भाई करम अपना-अपना, यही है भाई करम अपना-अपना !!
आशीष पाण्डेय "देव"
किसी को है सुखी रोटी को तरसना,
यही है भाई करम अपना-अपना ...
एक भाई दुसरे के, दुःख पर है हंसता,
मरते प्यासे भाई पर, पानी भी नहीं छिड़कता
एक को है मिलता, राजशी खाना,
दुसरे को तो है भूखे ही मरना
यही है भाई करम अपना-अपना ...
कलयुग की ऐसी कड़ी की लड़ी में,
मरना है प्यासे को पानी की झड़ी में,
नसीब नहीं है दुखिया को, पानी के भी छीटें पड़ना,
सुखियों के सर पर है बहता, मीठे पानी का सुन्दर झरना,
यही है भाई करम अपना-अपना, यही है भाई करम अपना-अपना !!
आशीष पाण्डेय "देव"
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