मेरी दीवानगी

मेरी कहानी प्यार की, जमीं और असमान की 
वो दीपक के उजियार की, और दीपक के अंधियार की 

वो चांदनी रात की चमकती एक किनारा थी,
सुबह- सुबह सूरज के लालिमा की नजारा थी,
आंखे पिलाये मंदिरा होंठो से रस बरसाती थी,
होली के रंगों में वो मिली है सावन के झूलों पे वो झूली है, 

देख लूँ उसे तो खिल जाये मेरा तन मन,
आँखों के उसके मस्ती दिल में मचाये हलचल,
अरमान मेरे दिल के आकाश पे चढ़ जाए,
सुखी धरा पे जैसे एक मेघ बरस जाये,

मै हूँ अलग कैसे ये दिल जनता  है ,  
ये में जानता हूँ और खुदा जानता है ,
ये तनहाई ये आंसू ये कशमकश जानता है ,
ये प्रेम में जलता मेरा बदन जानता है,

ये चौथे पहर का कहर जानता है ,
पानी में रहता बिन पानी मगर जानता है ,
कुम्हार की आग में पकता गागर जानता है ,
ये सागर की करुणा सागर जानता है ,

होंठ के बिरह को बासुरी जानती थी, 
प्रेमी कृष्ण के बिरह को दीवानी मीरा जानती थी,
शराब की बिरह को शराबी ही जानता है 
कविता की विरह को कवी ही जानता है ,

                                                              आशीष पाण्डेय"देव"

Comments

  1. hiiiiiii Mr. Ashish Pandey kya khub likhate ho.

    ReplyDelete
  2. hii! Ashish

    Apane bilkul aisa likha hai jaise ye kahani aap ke jeewan se kuch sambandhit hai...


    mai to aapaki deewani ho gayi hu...



    mera ek question hai kya ye apaki real story hai?

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

हजार गुड अन्ना हजारी के

तू कब मेरी होगी? नहीं जनता _ _ _

शराब "कलयुग का अमृत"