प्रेमी "एक परिभाषा"
एक प्रेमी हमेशा, खिलता कमल देखता है ,
नीचे का उसके, न दलदल देखता है,
वो देखे हमेशा ही, मुस्कराहट उसकी ,
न देखे कभी भी, घबराहट उसकी ,
पागल दीवाना दिल से, लाचार होता है ,
गुलाब को पाने के लिए, परेशान होता है ,
नयनों में उसकी प्रतिमा लिए, दर-बदर भटकता है ,
लेकिन गुलाब के काटों से, वो अनजान रहता है ,
याद करके उसको, दिन-रात भूल जाता है,
आधी-तूफान, कंकड़-पत्थर में, वो मिल जाता है ,
यादों के सहारे, सपनों के पुल बनाता है ,
अपनी जिन्दगी की झील में, उसके ही गुल खिलाता है ,
दीवाना ऐसा होता है, बैठे-बैठे ही खो जाता है ,
बिना लिए कलम ही, गजलों को लिख जाता है ,
पाने के लिए प्रेम को, तूफान भी बन जाता है ,
खुद है वो नाजुक शीशा, फिर भी पत्थर को पिघलाता है ,
ज़मी में कहाँ दम, आसमा भी थर्राता है ,
जब प्रेम को पाने के लिए, प्रेमी गुर्राता है ,
मानव में कहाँ दम, मालिक भी सर झुकाता है ,
जब सच्चा प्रेम-प्रेमी-प्रेमिका को लुटाता है ,
आशीष पाण्डेय "देव"
नीचे का उसके, न दलदल देखता है,
वो देखे हमेशा ही, मुस्कराहट उसकी ,
न देखे कभी भी, घबराहट उसकी ,
पागल दीवाना दिल से, लाचार होता है ,
गुलाब को पाने के लिए, परेशान होता है ,
नयनों में उसकी प्रतिमा लिए, दर-बदर भटकता है ,
लेकिन गुलाब के काटों से, वो अनजान रहता है ,
याद करके उसको, दिन-रात भूल जाता है,
आधी-तूफान, कंकड़-पत्थर में, वो मिल जाता है ,
यादों के सहारे, सपनों के पुल बनाता है ,
अपनी जिन्दगी की झील में, उसके ही गुल खिलाता है ,
दीवाना ऐसा होता है, बैठे-बैठे ही खो जाता है ,
बिना लिए कलम ही, गजलों को लिख जाता है ,
पाने के लिए प्रेम को, तूफान भी बन जाता है ,
खुद है वो नाजुक शीशा, फिर भी पत्थर को पिघलाता है ,
ज़मी में कहाँ दम, आसमा भी थर्राता है ,
जब प्रेम को पाने के लिए, प्रेमी गुर्राता है ,
मानव में कहाँ दम, मालिक भी सर झुकाता है ,
जब सच्चा प्रेम-प्रेमी-प्रेमिका को लुटाता है ,
आशीष पाण्डेय "देव"
hello Ashish !!
ReplyDeleteSach kah rahe ho yaar sachche premi bilkul aise hi hote hai......
Dharm..
wow Ashish Ji !!
ReplyDeletepremi ki isase barhiya paribhasha aur kahan mil sakti hai.................